बड़ा खुलासा : उत्तराखंड की जनता के पैसे से बिजली, छत्तीसगढ़ में प्लांट! 1320 MW सौदे पर कांग्रेस का हमला

  • 1320 मेगावाट बिजली खरीद पर कांग्रेस का हमला, पवन खेड़ा ने टेंडर प्रक्रिया पर उठाए सवाल।

देहरादून। उत्तराखंड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक खरीद को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस के मीडिया एवं पब्लिसिटी विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर टेंडर प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाने का आरोप लगाते हुए कई सवाल खड़े किए हैं। खेड़ा का दावा है कि 86 में से 84 टेंडर शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे प्रक्रिया का लाभ अदाणी पावर को मिला। इन आरोपों पर सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

दरअसल, 25 अगस्त 2026 को उत्तराखंड कैबिनेट ने यूपीसीएल को अदाणी पावर लिमिटेड से 25 वर्षों के लिए 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीदने की मंजूरी दी थी। सरकार के अनुसार, प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में अदाणी पावर सबसे कम बोलीदाता (L1) रहा। बिजली की स्वीकृत दर ₹5.746 प्रति यूनिट है।

सरकार के मुताबिक परियोजना के लिए छत्तीसगढ़ में कोयला ब्लॉक आवंटित है और अदाणी पावर वहीं 1320 मेगावाट का संयंत्र स्थापित करेगा। राज्य को वित्त वर्ष 2029-30 से बिजली मिलने की बात कही गई है। सरकार ने इस फैसले का उद्देश्य उत्तराखंड की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करना और दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करना बताया है।

THDC-UJVN के प्रस्ताव को लेकर भी सवाल

कांग्रेस ने मौजूदा बिजली खरीद व्यवस्था की तुलना पूर्व में प्रस्तावित THDC-UJVN परियोजना से करते हुए पूछा है कि पहले प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम को आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया। पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने प्रस्तावित परियोजना को समाप्त करने के बाद टेंडर की शर्तों में बड़े बदलाव किए।

हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि UERC के समक्ष 1320 मेगावाट RTC कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक खरीद को लेकर प्रक्रिया 2026 में चली और आयोग ने 8 जुलाई 2026 को खरीद की मात्रा से संबंधित आवेदन पर आदेश जारी किया था।

84 शर्तों में बदलाव का आरोप

पवन खेड़ा ने दावा किया कि टेंडर प्रक्रिया में 86 शर्तों में से 84 में बदलाव किए गए। उनके अनुसार इनमें बिजली की पूरी 1320 मेगावाट क्षमता एक ही बोलीदाता से लेने, संयंत्र को उत्तराखंड से बाहर स्थापित करने तथा ट्रांसमिशन/शिफ्टिंग से जुड़ी लागत जैसे प्रावधान शामिल थे।

कांग्रेस का आरोप है कि इन बदलावों ने प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया और अंततः अदाणी पावर को फायदा पहुंचा। इन विशिष्ट आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित टेंडर दस्तावेजों और संशोधित RFP/PSA की विस्तृत जांच जरूरी होगी।

25 साल का करार बना राजनीतिक मुद्दा

कैबिनेट के फैसले के तहत यूपीसीएल को अदाणी पावर के साथ 25 साल का पावर सप्लाई एग्रीमेंट करने के लिए अधिकृत किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदाणी पावर 1320 मेगावाट बिजली की आपूर्ति करेगा और अनुबंधित क्षमता 1234 मेगावाट बताई गई है।

कांग्रेस ने इसी दीर्घकालिक करार को लेकर राज्य पर संभावित वित्तीय बोझ और टेंडर की शर्तों को लेकर सवाल उठाए हैं। पवन खेड़ा ने 25 साल की अवधि में करीब ₹1.6 लाख करोड़ की वित्तीय देनदारी का दावा किया है। यह कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत अनुमान/आरोप है; इसे सरकारी देनदारी के आधिकारिक आंकड़े के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।

कांग्रेस ने सरकार से मांगा जवाब

पवन खेड़ा ने सरकार से पूछा कि THDC-UJVN के प्रस्ताव को क्यों आगे नहीं बढ़ाया गया, टेंडर की इतनी बड़ी संख्या में शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी और संयंत्र को उत्तराखंड के बाहर स्थापित करने की अनुमति क्यों दी गई। कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि 25 वर्षों के बिजली खरीद समझौते की वित्तीय और कानूनी शर्तें राज्य के हित में किस तरह हैं।

दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष है कि अदाणी पावर प्रतिस्पर्धी बोली में L1 रहा और यह फैसला राज्य की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा तथा बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए लिया गया है। अब विवाद का मुख्य केंद्र टेंडर की मूल और संशोधित शर्तें, बोली प्रक्रिया और 25 वर्षीय पावर सप्लाई एग्रीमेंट की वास्तविक वित्तीय देनदारी बन गया है।

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