लोकगीतों और जागरों से बेटी को कैलाश विदा कर रहे ग्रामीण

  • 12 साल बाद पहाड़ के सूने गांवों में लौटी रौनक

गोपेश्वर (चमोली)। 12 साल बाद आयोजित हो रही मां नंदा की बड़ी जात यात्रा धीरे-धीरे अपने अगले पड़ावों की ओर बढ़ रही है। बंड, बधाण और दशोली क्षेत्र की नंदा डोलियां विभिन्न पड़ावों पर पहुंच गई हैं। हर पड़ाव पर ग्रामीण पारंपरिक लोकगीतों और जागरों के साथ मां नंदा का स्वागत कर रहे हैं। नंदा की डोलियों के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ और गांवों में गूंज रहे जयकारों से माहौल भक्तिमय बना हुआ है।

बंड की नंदा डोली लुंहा दिगोली से मेहर गांव, गडोरा, गढ़ी, तल्ला अगथल्ला, सेमलडाला और पीपलकोटी होते हुए नौरख गांव पहुंची, जहां रात्रि विश्राम किया गया। वहीं मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली उस्तोली से सरपाणी और लांखी होते हुए भेंटी गांव पहुंची। कुरुड़-दशोली की नंदा डोली काण्डई से खलतरा, मौठा और चाका होते हुए सेमा गांव पहुंची। सभी पड़ावों पर ग्रामीणों ने डोलियों का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया।

मां नंदा की बड़ी जात यात्रा के चलते 12 साल बाद पहाड़ के सूने पड़े गांवों में भी रौनक लौट आई है। लंबे समय से बंद पड़े घरों के ताले खुल गए हैं और प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं। दूर-दराज क्षेत्रों में ब्याही गई बेटियां भी मायके पहुंची हैं। गांवों में रिश्तेदारों और मेहमानों के आने से चहल-पहल बढ़ गई है।

ग्रामीण मां नंदा को अपनी बेटी मानकर कैलाश के लिए विदा कर रहे हैं। विदाई के इस भावुक अवसर पर महिलाएं लोकगीत और जागर गा रही हैं। गांवों में हर घर के दरवाजे श्रद्धालुओं और मेहमानों के लिए खुले हैं। ग्रामीण मिल-जुलकर बाहर से आए लोगों के आतिथ्य में जुटे हुए हैं। नंदा की बड़ी जात ने पहाड़ की सामाजिक एकजुटता, लोक संस्कृति और पारंपरिक आतिथ्य को भी जीवंत कर दिया है।

 

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